चौथा किस्सा ' बाता थारी रह जासी'

चिलम से उन्होंने गहरा कश खींचा और धुंआ हवा में छोड़ दिया। हाथ से पगड़ी सिर पर व्यवस्थित करते हुए अपने रेवड़ पर निगाह घुमाई। रेवड़ की पन्द्रह सौ भेड़-बकरियां,दस गधे, चार महिलाओं और सात पुरुषों की जिम्मेदारी उन पर है। 

          हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी अक्टूबर में सिरोही से 4-5  रेवड़ निकले थे। उनमें से एक रेवड़ उनका भी था। सिरोही, बीजापुर, गोगुंदा, उदयपुर, बड़ी सादड़ी, छोटी सादड़ी, प्रतापगढ़ तक का सफर तो हमेशा की तरह बिना परेशानी के गुजर गया था।

           15 वर्ष की उम्र से ही वे रेवड़ के साथ चल रहे हैं। अब तो चलते हुए  50 वर्ष हो गए। इन रास्तों में हुए हर परिवर्तन के वे गवाह रहे। हाशिए पर उनका जीवन नहीं होता तो 50 वर्ष के इस सफर को वे एक 'इवेंट' की तरह मना रहे होते।वर्ष में 8 महीने घुमंतू जीवन जीने की मजबूरी है। रेगिस्तान उन्हीं जैसे लोगों के कारण जीवित है। मगर इसे मानता कौन है? भेड़, बकरियां और गधे ना हो तो रेगिस्तान में रहे ही कौन! सीमा सूनी पड़ जाए। पानी नहीं होने के कारण वहां आठ महीने घास-फूस भी नहीं मिलती। अबोले जानवर की जिंदगी के लिए घूमना मजबूरी है।


        65 साल के पुनाराम ने फिर से चिलम खींची। गा उठे- 

"बिंजारी भाई ए, आच्छी-आच्छी बोल तू रे

 प्यारी-प्यारी बोल, मीठी मीठी बोल

 बाता थारी रह जासी" 

         चिलम बुझने को आई थी। उन्होंने गाना बंद कर चिलम से राख झाड़ी। रेवड़ के आदमी जानवरों को दूह रहे थे। भेड़ औसतन आधा लीटर और बकरी एक लीटर दूध देती है। इतने दूध का अब करे तो क्या! पहले तो बेचकर आटा-दाल खरीद लेते थे। जब से मामनखेडा (रतलाम) के खेतों में आए, यही फस कर रह गए। लॉकडाउन की घोषणा हो गई। 21 दिन तो जैसे-तैसे गुजार लिए। फिर से लाॅकडाउन बढ़ा दिया। गांव में लोग घुसने नहीं देते। उन्हें लगता है कि हम बीमारी फैला देंगे। वे लोग भी गलत नहीं है। माहौल ही कुछ इस तरह का बना दिया गया है।

          मंदसौर के पास बैठे मलखासिंह के रेवड़ की भी यही हालत है। पहले तो जिसके खेत में रेवड़ बैठता था, वे दो दिन का खाना पानी दे देते थे। अब तो उसकी व्यवस्था भी नहीं। गांव में घुस नहीं पा रहे। खाने पीने का सामान नहीं ला पा रहे। मोबाइल चार्ज नहीं करा पा रहे हैं। पुलिस आगे-पीछे खिसकने नहीं दे रही। कुछ व्यवस्था की बात करो तो राजस्थान, मध्य प्रदेश की सरकार के नुमाइंदे एक दूसरे पर जिम्मेदारी डाल देते हैं। विनंती कर थक गए। मदद मत करो। कुछ उधार दे दो, वापस कर देंगे। मगर सुनता कौन है? 

             साथ लाई, रास्ते के खेतों में से इकठ्ठी की गई काचली और ग्वार की सूखी फलियों की चटनी से जिंदगी कब तक चलेगी। इन इक्कीस दिनों में आसपास के खेतों का भूसा, चारा खत्म हो गया। बेजुबान जानवर खाएंगे क्या? 

रेवड़ का पटेल अपनी बेजुबान भेड़ बकरियों के बारे में चिंतित था। देश का पटेल जुबान वालों को भेड़ बकरियों के रेवड़ में बदलकर चिंता मुक्त था।

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