व्यंग्य - शवासन में है नेताजी

मजबूरी थी । नगर पालिका के अध्यक्ष की सीट सरकार ने महिला के लिए आरक्षित कर दी थी । लोगों को लगा इससे नेताजी के सपने इससे चूर-चूर हो जाएंगे । ऐसे उनके सपने चूर-चूर होने लगे तो फिर वे नेताजी कैसे ?

जोड़-तोड़ कर सांसद फंड, विधायक फंड, पार्टी फंड में सहयोग राशि देकर उन्होंने पत्नी का पार्षद का टिकट पक्का कर लिया । छोटे से 300 वोटरों के वार्ड में, 50% की वोटिंग में 40 पर्सेंट वोट लाकर 10 उम्मीदवारों में से पत्नी पार्षद चुने ली गई। पार्टी को कुछ सीटें कम मिली थी तो 8-10 लाख में विरोधी दल के कुछ पार्षद जुटा कर उन्होंने पत्नी को अध्यक्ष पद पर भी पहुंचा दिया। वे अपनी नीति-रणनीति से खुश थे।

उनकी पत्नी पंचायत में सरपंच होती तो खुद ही सरपंच पति बनकर कुर्सी संभाल लेते और लोगों की नजरों में नहीं आते । मगर नगर पालिका में तो यह सब संभव नहीं था । उधर खर्च भी सूद के साथ वसूल करना था । जल्दी में थे इसलिए पालिका की दूसरी मीटिंग ही हंगामा खेज होने वाली थी । पत्नी डर गई। बोली- "कुछ गलत हुआ तो मुझे जेल जाना पड़ेगा।"

"ऐसे कैसे जेल जाना पड़ेगा ! आजकल तो रिश्वत का करोड़ों रूपया जज के घर में मिलता है तो वह कागज सिद्ध जाता है। तुम तो कागज पर भी साइन नहीं करोगी। अफसर करेगा। जेल जाना होगा तो वह जाएगा।"- नेताजी बोले।

अध्यक्षा फिर बोली- “ मैं मीटिंग में नहीं जाऊंगी । हो-हल्ला, धक्का मुक्की से मुझे डर लगता है । मैं भली और मेरा घर भला ।”

“डरती क्यों हो ? कुछ व्यवस्था बिठाते हैं।”- नेताजी ने उत्तर दिया।

दूसरे दिन सभा से पहले ही अध्यक्षा की कुर्सी लोहे के जंगले में थी यानी कैद में । कोई कैसे धक्का मुक्की कर उन तक पहुंचता । सारा एजेंडा हो-हल्ला के बीच पास हो गया । नेताजी अपनी पत्नी की एक बार की अध्यक्षता में सात पीढ़ियां तार लेना चाहते थे । नगर पालिका के रिटायर्ड लोगों को टुकड़े फेंक कर काम पर रख लिया । उलटे सीधे कामों का निकाल करने के रास्ते वे निकालने लगें। नगर पालिका के डरपोक मुख्य अधिकारी की नियम पूर्ण कार्य करने की आदत और हिस्सेदारी दोनों ही उनकी चाह में रुकावट डाल रहे थे। वे अपने आदमियों को खुली छूट देकर उनकी इज्जत उतरवाने पर उतर आए। हंगामा खड़ा हो गया। हमाम के नंगे सब बाहर दिखलाई पढ़ने लगे। लोगों को जब नंगापन ज्यादा दिखने लगा तो पार्टी को भी लगा की बहुत हुआ। डिफरेंट पार्टी, कहीं डिफीटेड पार्टी ना बन जाए। ऊपर से मामले को संभालने के लिए आदमी लगाए गए। लीपा पोती हुई। मान-मनोबल हुई। कुछ दिनों के लिए नेताजी को शवासन लगाने के निर्देश दिए गए।

अब नेताजी शवासन में है। डरी अध्यक्षा उखड़ी-उखड़ी सी कुर्सी पर चिपकी है।

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