कवि रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था - “आधुनिक भारत की संस्कृति एक ऐसे शतदल कमल के साथ उपमित की जा सकती है, जिसका एक-एक दल एक-एक प्रांतिक भाषा और उसकी साहित्य संस्कृति है। किसी एक को मिटा देने से उस कमल की शोभा की हानि होती है। हम चाहते हैं कि भारत की सब प्रांतिक बोलियां जिस में साहित्य सृष्टि हुई हो अपने-अपने घर की रानी बनाकर रहें।”
एक अनुमान के अनुसार विश्व में 6809 भाषाएं/बोलियां बोली जाती है। उनमें 905 भाषाओं को बोलने वालों की संख्या एक लाख से भी कम है। दूसरा अनुमान है की 2050 तक विश्व की 3000 भाषा/बोलियों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।
हमारे देश में इन दिनों जो खतरे में है उनकी संख्या/आंकड़ों का पता नहीं लगता। आप गूगल कर लीजिए मालवी भाषा बोलने वालों की संख्या आपको नहीं मिलेगी। जैसी स्थितियां दिखाई दे रही है,लगता है मालवी बोली शायद 2050 तक भी अपना अस्तित्व नहीं टिका पाए। यह अलग बात है की इस बीच उसको बचाए रखने के गंभीरता से प्रयास न हो जाए। जिसकी संभावनाएं कम ही लगती है।
खतरे की संभावना तो तभी महसूस होने लगती है जब किसी काम को लगातार करने की बजाए उसका सम्मान, उसकी सुरक्षा एक दिन के लिए करने का सोचा जाने लगे। जैसे- ‘हिन्दी दिवस’, ‘शिक्षक दिवस’, ‘बाल दिवस’। वैसे ही ‘मातृभाषा दिवस’।
मध्य भारतीय आर्य भाषा काल में भाषाओं का स्वरूप बिगड़ा और अपभ्रंश भाषा का उदय हुआ। ऐसे में शौर्यसेनी अपभ्रंश से निकली मालवी भाषा धीरे-धीरे जनमानस में अपनी पेठ बनाने लगी। मालवा पठार के अधिकांश हिस्सों में जन भाषा बन गई। मालवा का पठार यानी डॉ यदुनाथ सरकार के अनुसार- “स्थूल रूप से दक्षिण में नर्मदा नदी, पूर्व में बेटमा और उत्तर पश्चिम में चंबल नदी उसकी सीमा निर्धारित करती थी।” वही डॉ रघुवीरसिंह के अनुसार- “पश्चिम में कांठल और बांगड़ प्रदेश राजपूताना और गुजरात से पृथक करते थे और उत्तर पश्चिम में इसकी सीमाएं हाडोती प्रदेश तक पहुंचती थी। मालवा के पूर्व और पूर्व दक्षिण में बुंदेलखंड और गोंडवाना प्रांत फैले थे।” सामान्य तौर पर बोले तो भोपाल, नरसिंहगढ़, राजगढ़, झालावाड़, मंदसौर, नीमच, रतलाम, पूर्व झाबुआ, उज्जैन, इंदौर, देवास जिलों के आसपास मालवी बोली जाती है (अब ‘है’ बजाय ‘थी’ कहना ही ज्यादा उचित होगा)। व्हेन सॉन्ग ने इस प्रदेश के भ्रमण के बाद लिखा कि - “इनकी भाषा मनोहर और सुस्पष्ट है।” दसवीं शताब्दी के ग्रंथ ‘कुवलयमाला’ में 10 देशी भाषाओं का उल्लेख हुआ उनमें मालवी भी एक थी। मालवी बोलचाल की भाषा के रूप में ही काम में आती रही। मालवी में साहित्य की रचना बहुत कम हुई और जो हुई वह राजा महाराजाओं के कागज पत्रों, दानपत्रों, और पोथियों और मंदिरों में दबी पड़ी थी। जिसकी साज संभल थोड़े बहुत लोगों ने की। अब तो यह नष्टप्राय: ही मानी जाना चाहिए।
मालवी के विकास में संत साहित्य ने भूमिका निभाई। ‘पंथी’ साहित्य की रचना ज्यादा हुई। चंद्रसखी, मंदसौर के गुप्तानंद महाराज, केशवानंद आदि ने भी योगदान दिया। उनकी कुछ पुस्तकों का प्रकाशन भी हुआ। माच और तुर्रा-कलगी जैसे खेला जनमानस तक भाषा की पहुंच बनाने में अपनी भूमिका निभाते रहे। गोवर्धन पूजा पर ‘चंद्रावली’ गाई जाती रही। जन्म गीत, मुंडन गीत, विवाह गीत, मृत्यु गीत, धार्मिक अवसरों पर गाए जाने वाले गीत, बच्चों के गीत, गालियां सब महिलाओं की जबान पर होते थे। अब ना त्योहार मनाने का वैसा माहौल रहा ना वैसे गीत याद रखने वाली पीढ़ी रही तो मालवी को तो समाप्त होना ही है। पद्य की रचना बहुत हुई। कई कवियों ने कविताएं/गीत लिखें।
मालवी में गद्य बहुत ज्यादा नहीं लिखा गया। पन्नालाल नायब ने प्रहसन ‘मास्टर साहब की अनोखी छटा’ लिखा। फिर डॉ नारायण विष्णु जोशी ने ‘जमीदार’ नाटक लिखा। मुंबई में इसका मंचन हुआ। श्रीनिवास जोशी की धारावाहिक रचना - ‘वारे पठ्ठा भारी करी’ भी अपने समय में आकर्षित करती रही। डॉ मंगल मेहता की ऐतिहासिक कहानी ‘अण भिगो हुकों तलक’ भी चर्चित रही।अच्छे, प्रभावी भाषाशास्त्री के नहीं होने के कारण व्याकरण के नियम न बन पाए। हरेक 10-20 किलोमीटर पर यह अपना स्वरूप बदलती रही। ना राजनीतिक इच्छाशक्ति रही ना राजनीतिकों को इसकी जरूरत रही और मालवी बोली, बोली ही रही भाषा नहीं बन पाई। और तो और यह बोली अब तो कुछ गांवों में छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर , मालवा के क्षेत्र में बोली भी नहीं जाती।
मातृभाषा मालवी के समाप्त होने की ओर अग्रसर होने के कारणों पर यदि ध्यान दिया जाए तो जैसे गुजरात, बंगाल,दक्षिण के प्रदेशों में लोगों को अपनी भाषा बोलने में शर्म महसूस नहीं होती। मालवा क्षेत्र में इसे बोलने में शर्म महसूस की जाती है। शहरों में इसे पिछड़ेपन का प्रतीक माना जाता है। इस कारण घरों में बोलचाल में भी उपयोग में नहीं लाया जाता। गांवों में यह बोली जाती है परंतु नई पीढ़ी का शहरों से संपर्क और शहरों की ओर पलायन वहां पर भी अभिव्यक्ति के लिए इसे अमान्य कर रहा है। अब यह कुछ घरों में ही बोली जा रही इस कारण नई पीढ़ी इससे बिल्कुल कटती जा रही है। अभिव्यक्ति के लक्षणा, व्यंजना वाले शब्द गायब ही हो गए। अब तो वृद्धावस्था में पहुंची पीढ़ी भी उनका अर्थ नहीं जानती। सरकार की भी बोली को लिपिकरण कर, उपलब्ध साहित्य, गीतों का डिजिटाइजेशन कर संरक्षित करने की कोई मंशा नहीं दिखती। हम सब एक दिन मातृभाषा दिवस मना कर अपना कार्य संपूर्ण मान लेते है। हमें अपनी मातृभाषा के बजाय दूसरी भाषा ज्यादा जरूरी और अच्छी लगती है। ऐसे में हम मातृभाषा/ बोली के खत्म होने का इंतजार ही कर रहे होते हैं। माता के लिए तो वृद्धाश्रम की सुविधा भी होती है। मातृभाषा के लिए तो वह भी नहीं है जहां आप इसे छोड़कर आ जाए। अपने ही घर में बेबस, लावारिस की तरह मरना इसकी इसकी मजबूरी। लगता है इसके बेटे ही कह रहे हो- मसाणा में दूं थने ।
कमल की एक पत्ती का गिरना निश्चित रूप से कमल की सुंदरता को नष्ट करेगा और धीरे-धीरे कमल को। जब हिंदी के सामने ही खतरे हैं तो मालवी की क्या बात करें!
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