कविता- उनके समय में

लम्बा बरामदा और बड़ा सा चौक

हिस्सा होते थे

घरों का

उनके समय में,

कमरों की सटी/लगी दीवारें

देती नहीं जगह

झांकने के लिए

खिड़कियों को।

पालथी लगा

बरामदे में खाते हुए खाना

वे उछाल देते थे निवाला

चिड़ियां के लिए,

चुल्हें पर बनी

पहली रोटी होती गाय की

नीचे की रोटी होती कुत्ते के नाम

रोटियां गिनी नहीं जाती

शायद ही कम पड़ती कभी।

चुल्हें की आग

रखी जाती थी दबा कर

राख के नीचे

माचिस पैसे वालों का

गहना होती थी

उनके समय में।

कमाई के अवसर चाहे नहीं होते

पर गांव में आया अंजान

मेहमान होता पूरे गांव का

भूखा नहीं रहता वह

बिना भोजनालय वाले किसी भी गांव में

घर के मेहमान के लिए

रिश्तेदार, परिचित

निमंत्रण की लाइन लगा देते

होते नहीं थे

उनके समय में

मिष्ठान, चाट-भंडार

घर में ही बनते

हलवा, केसरियाचावल ,

कचोरी-पूरी और पकवान

अपनापन बांध लेता

पग

उनके समय में।

मेहमान भी रुकते थे

हफ्ता दसदिन

दिन रात लगायें नहीं फिरते थे

वे मुखोटे

हां,उपयोग में लाते थे उन्हें

मेले-ठेलो में मनोरंजन के लिए

गाड़ी, बंगला, मोबाइल चाहें नहीं होते

उनके समय में

समय सबके पास होता था

अपने परायों के लिए

उनके समय में।

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